प्रयागराज (माघ मेला) में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी के साथ कथित दुर्व्यवहार पर कांग्रेस युवा नेता अंकित गौरहा ने योगी सरकार पर साधा निशाना

प्रयागराज के पवित्र संगम तट पर मौनी अमावस्या के पावन अवसर पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती जी महाराज के साथ हुई कथित घटना ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है। उत्तर प्रदेश सरकार के गृह सचिव मोहित गुप्ता एवं पुलिस कर्मियों द्वारा उनके शिष्यों के साथ धक्का-मुक्की एवं मारपीट के आरोप लगने के बाद शंकराचार्य जी ने पवित्र स्नान से इंकार कर अपनी पालकी वापस लौटा दी। इस घटना को सनातन संस्कृति एवं धर्मगुरुओं के सम्मान पर हमला बताते हुए कांग्रेस के युवा नेता अंकित गौरहा ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर तीखी प्रतिक्रिया दी है।

अंकित गौरहा ने अपने उद्बोधन में कहा, 
“यह घटना मात्र एक संत के साथ दुर्व्यवहार नहीं, बल्कि पूरे सनातन धर्म और हमारी हजारों वर्ष पुरानी संस्कृति का अपमान है। सनातन संस्कृति में शंकराचार्य जैसे जगद्गुरु सर्वोच्च स्थान रखते हैं, वे हमारे धर्म के संरक्षक एवं मार्गदर्शक हैं। योगी सरकार ‘दिव्य-भव्य’ काशी-मथुरा-प्रयाग की बात करती है, लेकिन जब बात सच्चे संतों के सम्मान की आती है तो उनका असली चेहरा सामने आ जाता है। क्या यह वही सरकार है जो सनातन मूल्यों की रक्षा का दावा करती है? शिष्यों के साथ मारपीट कर, जगद्गुरु को स्नान से रोकना क्या सनातन संस्कृति का हिस्सा है? यह घोर निंदनीय है!”

उन्होंने आगे कहा, “सनातन संस्कृति हमें सिखाती है कि संत-महात्मा का सम्मान सर्वोपरि है। जब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर में मंदिर तोड़े गए तो भी स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी ने विरोध किया था। आज उसी संस्कृति के रक्षक के साथ ऐसा व्यवहार? योगी सरकार को चाहिए कि तत्काल जांच कराए और दोषियों पर कठोर कार्रवाई करे। यदि सनातन के संरक्षक असुरक्षित हैं तो ‘सबका साथ, सबका विकास’ का क्या मतलब रह जाता है?”

यह घटना माघ मेले के दौरान हुई, जहां लाखों श्रद्धालु मौनी अमावस्या के स्नान के लिए उमड़े थे। शंकराचार्य जी के शिष्यों ने आरोप लगाया कि भीड़ प्रबंधन के नाम पर उन्हें रोका गया और उच्च अधिकारियों ने बदसलूकी की। कांग्रेस नेता ने इस मामले को सनातन संस्कृति के अपमान से जोड़ते हुए केंद्र सरकार से भी हस्तक्षेप की मांग की है।

यह विवाद उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ रहा है, जहां धार्मिक भावनाओं और प्रशासनिक व्यवस्था के बीच संतुलन पर सवाल उठ रहे हैं।

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