हक की लड़ाई और सत्ता की ‘खामोशी’: लिंगियाडीह में लगभग 3 महीने से जारी है गरीबों का धरना


बिलासपुर :— शहर के लिंगियाडीह स्थित अपोलो अस्पताल के सामने पिछले दो से तीन महीनों से कड़ाके की ठंड और विपरीत परिस्थितियों के बीच गरीब वर्ग के लोग अपनी मांगों को लेकर धरने पर बैठे हैं। लेकिन विडंबना यह है कि महीनों बीत जाने के बाद भी सत्तापक्ष के किसी भी प्रतिनिधि या स्थानीय विधायक ने इन प्रदर्शनकारियों की सुध लेना मुनासिब नहीं समझा है।
धरने पर बैठे इन परिवारों को समाज के हर वर्ग, विभिन्न सामाजिक संगठनों और विपक्षी दलों का भरपूर समर्थन मिल रहा है। लोग इनके बीच पहुँच रहे हैं, इनका हौसला बढ़ा रहे हैं, लेकिन क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों की अनुपस्थिति चर्चा का विषय बनी हुई है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि चुनाव के समय घर-घर दस्तक देने वाले नेता आज उनकी तकलीफों से आंखें मूंद कर बैठे हैं।
लोकतंत्र में विधायक या मंत्री किसी एक विचारधारा या दल के नहीं, बल्कि पूरी जनता के होते हैं। उनके लिए हर नागरिक का मान-सम्मान और दुख बराबर होना चाहिए। लिंगियाडीह का यह धरना जनप्रतिनिधियों के उसी संवैधानिक और नैतिक कर्तव्य पर सवाल खड़ा कर रहा है:
* उपेक्षा या द्वेष?: क्या सत्ताधारी दल की यह चुप्पी महज लापरवाही है या इसके पीछे कोई द्वेषपूर्ण राजनीति है?
* संवेदनहीनता की पराकाष्ठा: महीनों से खुले आसमान के नीचे बैठे बुजुर्गों, महिलाओं और बच्चों का हाल जानने की फुर्सत स्थानीय विधायक को क्यों नहीं मिली?
* अश्वासन का अभाव: धरना समाप्त करवाना और समस्याओं का समाधान निकालना शासन की प्राथमिकता होनी चाहिए, लेकिन यहाँ ‘मौन’ का रास्ता चुना गया है।
> “जनप्रतिनिधि जनता का सेवक होता है, मालिक नहीं। जब समाज का एक बड़ा हिस्सा महीनों से न्याय की गुहार लगा रहा हो, तो उनकी उपेक्षा करना लोकतंत्र की गरिमा के खिलाफ है।”

जनता में बढ़ता आक्रोश
स्थानीय निवासियों का मानना है कि इस तरह का व्यवहार किसी भी जनप्रतिनिधि को शोभा नहीं देता। यदि समय रहते इन गरीब परिवारों की सुध नहीं ली गई और उनके दुख को नहीं समझा गया, तो आने वाले समय में यह ‘चुप्पी’ सत्तापक्ष के लिए भारी पड़ सकती है। जनता देख रही है कि संकट के समय कौन उनके साथ खड़ा है और कौन दूरी बना रहा है।

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