बिलासपुर :— लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में पहचान रखने वाली पत्रकारिता आज अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। चाहे वह प्रिंट मीडिया हो, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया या तेजी से उभरता वेब मीडिया, हर स्तर पर पाठकों और दर्शकों के बीच ‘विश्वसनीयता का संकट’ गहराता जा रहा है। शासन-प्रशासन और जनता के बीच सेतु का काम करने वाला यह क्षेत्र आज खुद अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है।
पत्रकारिता जो कभी समाज सेवा और मिशन का पर्याय थी, वह अब विशुद्ध व्यावसायिकता की भेंट चढ़ गई है। ‘पेड न्यूज’ और निजी स्वार्थों के चलते खबरों की तटस्थता समाप्त हो रही है।
बिना किसी ठोस संपादन और उत्तरदायित्व के वेब पोर्टलों की बढ़ती संख्या ने भ्रामक जानकारियों को बढ़ावा दिया है, जिससे पूरी बिरादरी की छवि धूमिल हुई है।
बिलासपुर प्रेस क्लब जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में भी आंतरिक खींचतान और गुटबाजी का असर साफ देखा जा रहा है। पत्रकारों के बीच एकता के अभाव और ‘अकेले का वर्चस्व’ स्थापित करने की होड़ ने संगठनों की गरिमा को ठेस पहुंचाई है।
आज स्थिति यह है कि पत्रकारों के हितों की रक्षा के नाम पर आए दिन नए-नए संगठन बन रहे हैं। बिलासपुर में भी अलग-अलग विचारधाराओं और व्यक्तिगत हितों के कारण संगठनों की संख्या बढ़ी है। जब नेतृत्व बिखरा हुआ होता है और हर कोई अपना वर्चस्व दिखाना चाहता है, तो शासन-प्रशासन भी पत्रकारों की समस्याओं को गंभीरता से नहीं लेता। सामूहिक शक्ति के अभाव में पत्रकार अपनी वाजिब मांगों के लिए भी कमजोर पड़ जाते हैं।
एक समय था जब पत्रकार की कलम से शासन-प्रशासन में हड़कंप मच जाता था, लेकिन आज विश्वसनीयता में कमी आने के कारण प्रशासन के अधिकारी भी पत्रकारों को संदेह की दृष्टि से देखने लगे हैं। जनता का भरोसा भी अब मुख्यधारा की मीडिया से डिगने लगा है, जो लोकतंत्र के लिए एक चिंताजनक संकेत है।
यदि पत्रकारिता को अपनी खोई हुई साख वापस पानी है, तो पत्रकारों को आत्ममंथन करने की आवश्यकता है। संगठनों को आपसी मतभेद भुलाकर एक मंच पर आना होगा और ‘व्यक्तिगत वर्चस्व’ के बजाय ‘सामूहिक कल्याण’ को प्राथमिकता देनी होगी। पत्रकारिता की मर्यादा और आचार संहिता का पालन ही इस संकट से निकलने का एकमात्र मार्ग है।

