छत्तीसगढ़ :- शहरों की तर्ज पर अब ग्रामीण इलाकों में भी निजी और सरकारी स्कूलों का जाल तो बिछ गया है, लेकिन “गुणवत्तापूर्ण शिक्षा” और “सुरक्षित वातावरण” के दावे धरातल पर दम तोड़ते नजर आ रहे हैं। जिले के शहरी क्षेत्रों में किराए की दुकानों में चल रहे स्कूलों का मामला सामने आने के बाद अब ग्रामीण अंचलों की भी कड़वी सच्चाई उजागर हो रही है।
शासन के कड़े दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी भी स्कूल को मान्यता प्राप्त करने के लिए पर्याप्त भूमि (न्यूनतम 50 डिसमिल से 1 एकड़), सुरक्षित पक्का भवन, खेल मैदान, पृथक शौचालय और हवादार कमरों का होना अनिवार्य है। लेकिन जिले के हजारों ग्रामीण स्कूलों में स्थिति इसके ठीक उलट है:
कई स्कूल आज भी पुराने जर्जर मकानों या ऐसे परिसरों में चल रहे हैं जहाँ बच्चों के खेलने के लिए एक इंच जगह भी उपलब्ध नहीं है।
शुद्ध पेयजल और क्रियाशील शौचालयों की कमी के कारण विशेषकर छात्राओं को भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
सबसे बड़ा सवाल शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर उठता है। जब नियम इतने स्पष्ट हैं, तो इन स्कूलों को मान्यता देने से पहले भौतिक सत्यापन कैसे किया गया? स्थानीय अभिभावकों का आरोप है कि विभाग के अधिकारी केवल कागजी खानापूर्ति कर इन स्कूलों को संचालित होने की अनुमति दे देते हैं, जिससे बच्चों का भविष्य और सुरक्षा दोनों दांव पर लगे हैं।
“शिक्षा का अर्थ केवल पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं, बल्कि एक सुरक्षित और प्रेरक वातावरण देना भी है। तंग कमरों में घुटती शिक्षा बच्चों के मानसिक और शारीरिक विकास को बाधित कर रही है।”
एक जागरूक नागरिक
प्रमुख समस्याएँ एक नज़र में:
| भूमि: न्यूनतम 50 डिसमिल से 1 एकड़ | हकीकत: कई स्कूल मात्र 2-3 कमरों में सिमटे हैं। |
| खेल मैदान: अनिवार्य | हकीकत: गली या सड़क ही बच्चों का खेल मैदान है। |
| सुरक्षा: अग्निशमन यंत्र और सुरक्षित भवन | हकीकत: जर्जर छतें और बिजली के झूलते तार। |
| स्वच्छता: बालक-बालिकाओं के लिए अलग शौचालय | हकीकत: अधिकांश जगहों पर शौचालय या तो नहीं हैं या उपयोग के लायक नहीं। |
ग्रामीण क्षेत्रों में हजारों बच्चों का भविष्य इन ‘अमानक’ स्कूलों के भरोसे है। यदि समय रहते जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग ने इन पर कड़ी कार्रवाई नहीं की और मानकों का सख्ती से पालन नहीं कराया, तो शिक्षा व्यवस्था केवल एक व्यापार बनकर रह जाएगी। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन इन स्कूलों की विस्तृत जांच कर उनकी मान्यता रद्द करेगा या बच्चों के भविष्य से यह खिलवाड़ यूँ ही जारी रहेगा।

