तरुण मिश्रा द्वारा स्पेशल रिपोर्ट
बिलासपुर (स्पेशल रिपोर्ट) : छत्तीसगढ़ के बिलासपुर और जांजगीर-चांपा जिलों में सड़कों पर आवारा गौवंशों की मौजूदगी अब जानलेवा खतरा बन चुकी है। बलौदा से बिलासपुर तक के 50 किलोमीटर लंबे मुख्य मार्ग पर हर 1-2 किलोमीटर पर सैकड़ों गायें सड़क के बीचों-बीच बैठी नजर आ रही हैं, जो वाहन चालकों के लिए घातक साबित हो रही हैं। जिला प्रशासन द्वारा जुलाई माह में जारी किए गए सख्त आदेश—जिनमें सड़क पर गायें दिखने पर मालिकों को जुर्माना लगाने और सरपंच-सचिवों को सक्रिय करने का प्रावधान था—केवल कागजों तक सीमित रह गए हैं। दो-चार दिनों की सतही कार्रवाई के बाद यह अभियान ठंडे बस्ते में डाल दिया गया, जिसका खामियाजा आज भी भुगता जा रहा है। हाल के महीनों में इसी तरह की लापरवाही से 30-40 गायों की मौत हो चुकी है, और अब लगता है प्रशासन ऐसी ही भयावह घटनाओं का इंतजार कर रहा है।
जुलाई 2025 में बिलासपुर कलेक्टर संजय अग्रवाल और एसपी रजनेश सिंह ने आवारा पशुओं से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकने के लिए एक संयुक्त बैठक बुलाई थी। इस बैठक में स्पष्ट निर्देश जारी किए गए कि यदि सड़क पर कोई मवेशी दिखा तो उसके मालिक को सह-आरोपी बनाया जाएगा। खुले में पशु छोड़ने पर 5,000 से 10,000 रुपये तक का जुर्माना और आईपीसी की धारा 291 तथा पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 की धारा 11(1) के तहत कानूनी कार्रवाई का प्रावधान किया गया। सरपंचों और ग्राम सचिवों को विशेष जिम्मेदारी सौंपी गई—उन्हें गौवंशों की निगरानी कर मालिकों को चेतावनी देने और दोषियों पर तत्काल जुर्माना लगाने का आदेश था।
ये आदेश जारी होने के तुरंत बाद कुछ कार्रवाई भी हुई। बिलासपुर जिले में रतनपुर और कोनी थाना क्षेत्रों में 4-5 मामलों में मालिकों पर जुर्माना लगाया गया, और गौवंशों को पंचायत स्तर पर आश्रय स्थलों में पहुंचाया गया। लेकिन यह जोश केवल 3-4 दिनों तक चला। उसके बाद न तो रात्रिकालीन गश्त बढ़ाई गई, न ही सरपंच-सचिवों की रिपोर्टिंग सिस्टम मजबूत की गई। नतीजा? सड़कों पर गायों का जमावड़ा फिर से शुरू हो गया। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि “आदेश तो कलेक्टर साहब के टेबल पर अच्छे लगते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई अमल नहीं। गौसेवक भी दिन में चाय की दुकानों पर नजर आते हैं, रात में सड़क पर कोई नहीं।
30-40 गायों की मौत ने जगाई चिंता
पिछले तीन महीनों में बिलासपुर-जांजगीर-चांपा क्षेत्र में आवारा गौवंशों से जुड़ी दुर्घटनाओं ने प्रशासन की लापरवाही को उजागर कर दिया।
इन घटनाओं में केवल गायों की ही नहीं, बल्कि मानव जीवन का भी खतरा बढ़ा है।
जुलाई से सितंबर तक के आंकड़ों के अनुसार, बिलासपुर और जांजगीर-चांपा में 30-40 गौवंशों की मौत हुई, और दर्जनों मानव दुर्घटनाएं दर्ज की गईं।
इन हादसों के बाद गौसेवक तो सड़क जाम कर हल्ला मचाते हैं, लेकिन स्थायी समाधान के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाते।
बिलासपुर हाईकोर्ट ने इन घटनाओं पर स्वत: संज्ञान लेते हुए कई बार सरकार और एनएचएआई को फटकार लगाई है। अगस्त 2025 में कोर्ट ने कहा कि “राज्य और एनएचएआई के कदम अपर्याप्त हैं। सड़कों पर मवेशियों के लिए आश्रय स्थल बनाएं, जनजागरूकता अभियान चलाएं।” कोर्ट ने सोलर लाइट्स, इंडिकेटर बोर्ड लगाने और ग्राम सभाओं में जागरूकता के निर्देश दिए, लेकिन अमल धीमा है।
बलौदा-बिलासपुर मार्ग पर खतरे की घंटी
15 अक्टूबर 2025 को बलौदा से बिलासपुर की यात्रा के दौरान मुख्य मार्ग पर यह दृश्य स्पष्ट दिखा। बलौदा,चारपारा,कुली,गुड़ी,सीपत,लगरा पंधी जैसे गांवों के आसपास हर किलोमीटर पर 20-30 गायें सड़क पर आराम कर रही थीं। रात्रिकालीन अंधेरे में ये गायें अदृश्य हो जाती हैं, जो वाहन चालकों के लिए घातक साबित होती हैं। रात हो या दिन सड़क पर गायों का झुंड दिखना आम है लेकिन रात में ब्रेक मारने का मौका ही नहीं मिलता ।जांजगीर-चांपा के बलौदा क्षेत्र में भी यही हाल है, जहां ग्रामीण सड़कों पर गायें ट्रैफिक को बाधित कर रही हैं।
प्रशासन ने सितंबर में रात 10 से सुबह 2 बजे तक गश्त शुरू की थी, लेकिन यह भी अनियमित है। टोल-फ्री नंबर (1077) जारी किया गया है, जहां सड़क पर मवेशी दिखने पर शिकायत की जा सकती है, लेकिन कॉल सेंटर की प्रतिक्रिया धीमी है।
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि शासन-प्रशासन और गौसेवकों को तत्काल सक्रिय होना चाहिए।महीने-दो महीने तक रात के समय सर्वे करें। प्रत्येक गांव में गौशाला मजबूत करें, मालिकों को ट्रेनिंग दें। वाहनों में स्पीड लिमिटर लगाएं और गौसेवकों को वेतनबद्ध करें। इससे न केवल गायों की, बल्कि मानव जीवन की भी रक्षा होगी।” ग्रामीणों ने मांग की है कि सरपंच-सचिवों की जवाबदेही तय करें, और जुर्माने की राशि को गौशाला फंड में डालें।
यदि यही लापरवाही जारी रही, तो अगला हादसा बड़ा हो सकता है। हाईकोर्ट के आदेशों का पालन कर प्रशासन को अब जमीनी स्तर पर उतरना होगा, वरना सड़कें कब्रिस्तान बन जाएंगी।

