बिलासपुर // स्वामी आत्मानंद शासकीय उत्कृष्ट अंग्रेजी माध्यम स्कूल, तिलकनगर (बिलासपुर) इन दिनों एक अजीबोगरीब शैक्षणिक विवाद के केंद्र में है। स्कूल की कक्षा 9वीं और 11वीं के करीब 20-22 छात्र मुख्य परीक्षा के बाद पूरक (सप्लीमेंट्री) परीक्षा में भी अनुत्तीर्ण हो गए हैं। अब इन छात्रों के अभिभावकों द्वारा स्कूल प्रबंधन और शिक्षा विभाग पर दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है, जो कि गंभीर चिंता का विषय है।
मिली जानकारी के अनुसार, कक्षा 9वीं और 11वीं के इन विद्यार्थियों को स्कूल प्रबंधन द्वारा नियमानुसार अपनी गलतियां सुधारने और पास होने का एक अतिरिक्त मौका (पूरक परीक्षा) दिया गया था। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इन सभी छात्रों को स्ट्रां क्लास के लिए भी बुलाया गया जिसमें इन्होंने उपस्थित नहीं हुआ इसके बाद दोबारा परीक्षा देने के बावजूद इन छात्रों का प्रदर्शन बेहद निराशाजनक रहा। अधिकांश छात्रों ने पूरक परीक्षा में महज 2 से 10 नंबर ही हासिल किए हैं।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि जो छात्र बुनियादी आंतरिक परीक्षाओं में दहाई का आंकड़ा भी पार नहीं कर पा रहे हैं, वे अगले सत्र में 10वीं और 12वीं जैसी बोर्ड परीक्षाओं के कड़े मापदंडों का सामना कैसे करेंगे?
इस पूरे मामले पर स्कूल की प्राचार्य मिस श्रद्धा गौरहा ने बेहद व्यावहारिक और कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि:
“छात्रों की शैक्षणिक बुनियाद बेहद कमजोर है। बिना योग्यता के केवल ग्रेस (कृपांक) नंबर देकर उन्हें अगली कक्षा में भेज देना न तो शासकीय नियमों के तहत संभव है और न ही यह छात्रों के हित में है। अगर आज इन्हें गलत तरीके से पास कर दिया गया, तो अगले साल बोर्ड परीक्षा में इनका भविष्य और भी बुरी तरह प्रभावित होगा।”
प्राचार्य गौरहा का यह कथन पूरी तरह से शासकीय नियमावली और शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखने के संकल्प को दर्शाता है। शिक्षाविदों का भी मानना है कि बिना तैयारी के छात्रों को प्रमोट करना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ करने जैसा है।
एक तरफ जहां स्कूल प्रबंधन शिक्षा के स्तर को सुधारने और नियमों का पालन करने पर अड़ा है, वहीं दूसरी तरफ अनुत्तीर्ण छात्रों के अभिभावकों ने अपनी जिम्मेदारी समझने के बजाय स्कूल और शिक्षा विभाग को ही घेरना और बदनाम करना शुरू कर दिया है।
विभागीय जानकारों का कहना है कि पालकों का यह रवैया न सिर्फ शिक्षकों का मनोबल गिराने वाला है, बल्कि बच्चों को भी यह संदेश देता है कि बिना पढ़े भी दबाव बनाकर पास हुआ जा सकता है।
आत्मानंद स्कूल तिलकनगर का यह मामला यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम बच्चों को सिर्फ ‘पास’ की डिग्री देना चाहते हैं या उन्हें काबिल बनाना चाहते हैं? प्राचार्य श्रद्धा गौरहा का नियमों पर टिके रहने का फैसला यह साबित करता है कि शिक्षा प्रणाली में सुधार के लिए कड़े कदम उठाना आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है।

